विनम्र मंदिर

मूल कोंकणी – आर.एस.भास्कर
हिंदी अनुवाद – बालचंद्रन के.बाबू

पुरातन विनम्र मंदिर
गाँव में हमारे
देवता के देह पर
नहीं कोई आभूषण अलंकृत है-
इसके कारण
ये विनम्र मंदिर बिना कोई शान का है।

नहीं आवाज़ किसी समाहारात्मक वाद्यसंगीत
पूजा के लिए सुबह, दोपहार और रात को
कोई पंडल  नहीं
किसी फ़ुसरतवाली गप्तशप के लिए
इसके कारण
ये विनम्र मंदिर बिना कोई शान का है।

पूर्णिमा के दिन कार्तीक माह में
कोई दावत नहीं दी जाती।
चैत्र माह में
दिग्विजय का त्योहार नहीं मनाया जाता।
इसके कारण
ये विनम्र मंदिर बिना कोई शान का है।

भेंट के वास्ते डालने को एक सिका
एक भंडार बी नहीं है।
दर-सूची भी नहीं दी गई है

मेंट के लिए पूजा–अर्चना देवता को
इसके कारण
ये विनम्र मंदिर बिना कोई शान का है।

कोई मंदिर की टंकी नहीं है
लेने को एक पावन स्नान।
और एक छोटी पकी लेने
नहीं है कोई प्रासाद भी मंदिर के आसपास
इसके कारण
ये विनम्र मंदिर बिना कोई शान का है।

देवता इस पुरातन विनम्र मंदिर में हमारे गाँव के
आएँगे हमारी रक्षा के लिए हमारे पुकार पर
देवता इस पुरातन विनम्र मंदिर में हमारे गाँव के
हैं बड़े दयालु
और ऐसे महान देवता के मंदिर के लिए
हैं कोई ज़रूरत शान की ?

To read the original Konkani version of this poem please visit the link :
http://www.akshra.org/देवळी

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AKSHRA
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