सत्ता

– वाजपेयी

मासूम बच्चों,
बूढ़ी औरतों,
जवान मर्दो,
की लाशों के ढेर पर चढ़ कर
जो सत्ता के सिंहासन तक
पहुँचना चाहते हैं
उनसे मेरा एक सवाल है:।

क्या मरने वालों के साथ

उनका कोई रिश्ता न था?

न सही धर्म का नाता,
क्या धरती का भी संबंध नहीं था?
“पृथिवी माँ और हम उसके पुत्र हैं।”

अथर्ववेद का यह मंत्र
क्या सिर्फ जपने के लिए है,
जीने के लिए नहीं?

आग में जले बच्चे,
वासना की शिकार औरतें,
राख में बदले घर
न सभ्यता का प्रमाण पत्र हैं,
न देशभक्ति का तमगा,
वे यदि घोषणा–पत्र हैं तो पशुता का,
प्रमाण हैं तो पतितावस्था का,  ऐसे कपूतों से
माँ का निपूती रहना ही अच्छा था,
निर्दोष रक्त से सनी राजगद्दी,
श्मशान की धूल से भी गिरी है,
सत्ता की अनियंत्रित भूख
रक्त-पिपासा से भी बुरी है

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