अन्तिम कविता

मूल कोंकणी : शरतचंद्र शेणै
हिन्दी परिभाषा : अमृतलाल मदान

अन्तिम कविता कौंधती है औचक यूं मस्तिष्क में
ज्यों धनेरे बादलों में दिपती चकाचौंध है
इसके लिखने हेतु मुझे लेखनी ना चाहिए
ना ही मुझको चाहिए पृष्ठ कागज का कभी !

जागते नयनों के आगे स्वप्न आ आ नाचते
किंतु अन्तिम कविता जब प्रकटेगी इनके सामने
मेरे अधरों तक नहीं पहुँचेगी इसकी रश्मियाँ
गुनगुना पाऊँगा उसकी पंक्तियाँ भी मैं कहां !

जिस तरह करती हवाएँ सुबह की अठखेलियाँ
मत्त और उन्मत्त आकर के किसी उपवन में जब
जिस तरह किसी इन्द्रधनु के सप्त सुंदर मोर रंग
डूब जातें हैं कभी तो तैर आतें है कभी |

जिस तरह जब साँझ की वेला बिखरती है छटा
दूर क्षितिजों पर सिंदूरी सात्विक सौंदर्य की
अन्तिम कविता ऐसे आ चमकेगी मेरे रूबरू
छू नहीं पाऊँगा उसको, शब्द तोडूँगा नहीं |

जिस तरह बरखा की बूंदें तृप्त करती हैं धरा
जेठ की तपती दुपहरी में कभी जब रिमझिमा
पंख बन उग आएगी कविता तो मेरी पीठ पर
तैरता लहरें हवा की मैं उडूंगा रूई-घन सा !

रो रहे ज्यों बाल मुख पर मंद हंसी सी फूटती है
आंसुओं के बीच फूटेगी वो कविता भी मेरी
भूल जाऊँगा समय को यूँ खडा मैं मुग्ध सा
खुद ही बन जाऊँगा कविता, पंख धरती को छुवा !

saratchandrashenoi@gmail.com

मैं नीर भरी दुःख की बदली

 महादेवी वर्मा

मैं नीर भरी दुःख की बदली,
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनो में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झनी मचली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वांसों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का भर बनी अविरल,
रज कण पर जल कण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

पथ न मलिन करते आना
पद चिन्ह न दे जाते आना
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमटी कल थी मिट आज चली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

***

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ठाकुर जी भोले हैं

Mahadevi Verma

(1907-1987)

Mahadevi Verma is a major poet of Chhayavaad school of Hindi literature. She is considered as a child prodigy as she started writing at a very young age. She was a child bride too as she was married when she was 9. Interestingly, in spite of this background, she had a college education and earned a Master’s degree in Sanskrit. She is a Jnanpith awardee and Sahitya Akademi fellow

ठंडे पानी से नहलातीं,
ठंडा चंदन इन्हें लगातीं,
इनका भोग हमें दे जातीं,
फिर भी कभी नहीं बोले हैं।
माँ के ठाकुर जी भोले हैं।

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सत्ता

– वाजपेयी

मासूम बच्चों,
बूढ़ी औरतों,
जवान मर्दो,
की लाशों के ढेर पर चढ़ कर
जो सत्ता के सिंहासन तक
पहुँचना चाहते हैं
उनसे मेरा एक सवाल है:।

क्या मरने वालों के साथ

उनका कोई रिश्ता न था?

न सही धर्म का नाता,
क्या धरती का भी संबंध नहीं था?
“पृथिवी माँ और हम उसके पुत्र हैं।”

अथर्ववेद का यह मंत्र
क्या सिर्फ जपने के लिए है,
जीने के लिए नहीं?

आग में जले बच्चे,
वासना की शिकार औरतें,
राख में बदले घर
न सभ्यता का प्रमाण पत्र हैं,
न देशभक्ति का तमगा,
वे यदि घोषणा–पत्र हैं तो पशुता का,
प्रमाण हैं तो पतितावस्था का,  ऐसे कपूतों से
माँ का निपूती रहना ही अच्छा था,
निर्दोष रक्त से सनी राजगद्दी,
श्मशान की धूल से भी गिरी है,
सत्ता की अनियंत्रित भूख
रक्त-पिपासा से भी बुरी है

***

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AKSHRA
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