नमी

In Tami: Maalan

Translation in Hindi:Anuradha Krishnaswamy

पैर के अंगूठे में अपने शरीर की पूरी ताकत भर उसने अपने शरीर को ज़ोर से हवा में पीछे उछाल दिया. शरीर के उछाल से गति पाकर आंगन में लगा विशाल आकर का झूला जिसपर एक साथ तीन से चार लोग बैठ सकतें हैं ,उसे ले हवा से बातें करने लगा. जब जब झूला आगे आता वापस इसके पैर उसे पीछे धकेल देते . एक बच्चा अपने हाथों में कागज के कुछ टुकड़े पकड़े “टिकेट-टिकेट “चिल्लाकर झुले में बैठे बच्चों को दे रहा था ,बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी बस का कंडक्टर बस यात्रियों को टिकेट दे रहा हो.

दूसरा राग अलाप रहा था

“ज़ोर लगा के हइसा”

और तीसरा अपने एक हाथ से झूले की जंजीर पकड़ दूसरे हाथ को हवा में उछाल उछाल कर चिल्ला रहा था –

“ज़ोर से भाभी ,और ज़ोर से”

ये सब देख इसे हंसी आ रही थी.

अपने भरे -पूरे सुडौल शरीर की वजह से वो 40 -45 की लगती थी.

बच्चों के बीच बच्ची बनी एक अधेड़ उम्र की औरत झूले पर बैठी झूलने के मज़े बिल्कुल वैसे ही ले रही थी जैसे कोई बच्चा किसी मेले में अपने मनपसंद झूले के ले।

अब ये नज़ारा देख किसे हंसी नही आएगी ?

बच्चों के झुंड में बच्ची बन खेलती ये  औरत दरअसल किसी की भाभी है ही नहीं .

शादी के दस -बारह साल बाद भी जब भाभी को संतान सुख ना मिला तब दूर के रिश्ते से इसे गोद लिया गया था.

पता नही क्यों ? इसका मन उसे माँ पुकारने का नहीं हुआ.

तकरीबन आठ साल का था ये उस समय जब इसे गोद लिया गया,नाक बहती रहती थी और शरीर में दिलोदिमाग और उम्र के अनुसार बदलाव हो रहे थे ।शायद बदलती उम्र का तकाजा था इसने उसे भाभी कहना शुरू कर दिया।

तब उसे ये शब्द अजीब लग रहा था क्योंकि मन में एक दबी इच्छा थी माँ बनने की।तब से ये शब्द ही उसकी पहचान बन गया है।घर हो ,रिशेतेदारी हो, अडोस -पड़ोस हो या हो गली -मोहल्ला।

और वो बन गई गई सबकी भाभी।

जगत भाभी।

भाभी का कोई बच्चा नही था । जीवन के इस क्रूर सत्य के बावजूद वो कभी निराश नहीं हुई ,उसने अपने अंदर कड़वाहट को कभी कोई जगह नहीं बनाने दी,सभी से ऐसे घुल -मिल कर रहती जैसे घी -खिचड़ी।

पूरे गाँव को दिल से स्वीकार कर लिया था उसने ।सबके लिए उसके पास सिर्फ प्यार था।

प्यार जो सामने वाले को गले लगाकर प्यार के बोझ से दबा  न डाले ।

प्यार जो ज्यादा बात ना करे

प्यार जो बर्ताव में दिखे

प्यार जो शांति दे

प्यार सहज प्यार .

बिना किसी आडम्बर के

निश्चल,निस्वार्थ प्यार

चाँद -सूरज की रोशनी सा

सबके लिए एक सा

उसके प्यार की इस गरमाहट में ना जाने कितने जीवों ने जीवन पाया।

फले -फूले ।

उनमें “भुवना”भी एक थी।

इसे भुवना के बारे में ऐसा लगता था जैसे वो इसी के लिए बनी हो। इसके पास ढंग का कोई काम धंधा ना होने के कारण वो कुछ माह पहले किसी और से ब्याह कर चली गई. इस बात का इसको ज्यादा दुख नहीं था,मगर मायूस था।अपने अंदर ही सिमट गया है ये तबसे।

पर भाभी तो केवल नाम की भाभी थी।असल में तो उसने माँ बनकर पाला था इसे। बिना इसके कुछ बताये भी समझती थी वो इसके मन की व्यथा ।किसी भी कारण इसका मन दुखी ना हो इसका विशेष ध्यान रखती थी भाभी।

भाभी को देखते ही ये अपने मनोभावों पर नियत्रण खो बैठता और इसकी रुलाई फूट पड़ती ।

और भाभी बिना एक शब्द कहे ना जाने कैसे इसे सम्भाल लेती ।

एक दिन जब ये घर लौटा तो देखा भाभी घर के आंगन में बैठ चावल साफ कर रही थी।इसको देखते ही उठ खड़ी हुई ।

ये हाथ -मुंह धो झूले पर बैठा ही था कि भाभी इसके लिए कॉफी लिए हाज़िर हो गई .। कॉफी का गिलास इसके हाथ में देते हुए बोली –

“आज सरस्वती आई थी.” ”

“क्या चाहिए उसे ”

“भुवना और दामाद को कल खाने पर बुलाया है उन्होंने ”

इसके चेहरे के भावों को पढ़ने का प्रयास करते भाभी बोली –

“कह रही थी कि यदि मेहमानों की खातिरदारी हमारे घर में हो तो अच्छा रहेगा ,अगर हमें कोई एतराज़ ना हो तो ? मैनें  हाँ कर दी”

“अब तुम ज़रा मदद कर देते मेरी, तो इस झूले को उतार कर अंदर रख देते हैं.”

इसने बिना कुछ कहे -सुने एक झटके से झूले से उठ,पलक झपकते ही झूले को नीचे उतार झूले की जंजीर को ऊपर लटके हुक में अटका दिया।

भाभी ने पानी से पूरा आंगन साफ करके सुंदर सी रंगोली बनाई और आँगन को एकदम सजा दी।

अचानक इसे अपना ही घर बहुत सुंदर दिखने लगा ।

तभी इसकी नज़र हुक में टंगी झूले की जंजीर पर पड़ी ।

वो जंजीर इसे भुवना के शादी के दिन उसके के गले में पड़ी वरमाला की तरह दिखने लगी ।

उस पूरे दिन जब भी वो जंजीर हिलती, इसे भुवना याद आती ।

हर बार उस जंजीर को गले में डालकर लटक जाने का मन करता रहा था  इसे।

अंतर्द्वंद ऐसा जैसे जीवन -मृत्यु की परीक्षा चल रही हो इसकी ।

हवा में लटकी झूले की जंज़ीरें एक -दूसरे से टकराकर आवाज़ें कर रही थी ।इसे लगा जैसे जंज़ीरें “भुवना -भुवना “कह इसे चिढ़ा रहीं हैं .

जंज़ीरों की आवाज़ो को रोकने के लिए ये उन पर लटककर कसरत करने लगा।

जब उतरा तो जंज़ीरें वापस “भुवना -भुवना”कहने लगी .

इस बार इसने उन आवाज़ों को रोकने के लिए मेहमानों के बच्चों को झूले पर बैठा उन्हें झुलाना शुरू कर दिया।

जंज़ीरों की आवाज़ को और कम करने के लिए इसने जंज़ीरों को तेज तेज़ धक्का देना शुरू कर दिया ।इससे घबराकर बच्चे चिल्लाने लगे  और उनको को चिल्लाते देख इसके मन को एक अजब सी शांति मिली। परपीड़क सी खुशी ।

बच्चों की इस पीड़ा से इसे लगा जैसे इसने भुवना से बदला ले लिया हो ।

मेहमानों के चले जाने के बाद जब झूले को वापस लगाने के लिए निकाला तो इसे झूले पर पैरों के निशान दिखाई दिए ।

उन निशानों ने झूले को बहुत गंदा कर दिया था।इसने झूले को साफ करने की नाकामयाब कोशिश की।

जितनी कोशिश करता,  निशान ज्यादा गहरा और भद्दा होता जाता।

बिल्कुल भुवना की याद की तरह ।

भुवना की याद को अपने दिलोदिमाग से मिटाने की जितनी ज्यादा कोशिश करता, याद उतनी  ही ज्यादा गहरी होती जाती थीं।

किसी के आने की आहट सुन इसने पुस्तक से सिर निकाल देखा तो पड़ोस वाली सरस्वती जी दिखाई दीं ।बिना किसी औपचारिकता के वो अंदर चलीं आई जैसे अपने ही घर में आई हों।

सरस्वती काकी आँगन से ही ज़ोर से बोली –

-भाभी ,दूध का बर्तन तुम्हारे यहां छोड़े जा रही हूँ। दूधवाला आये तो उससे दूध लेकर गर्म कर रख लेना ।

-ठीक है .कहाँ जा रही हो?फ़िल्म देखने जा रही हो क्या ?

-हाँ भाभी

-लगता है भुवना के बापू कहीं बाहर गए हुऐ हैं .

-हाँ ,कैम्प में गये हैं ,उनके होते कहीँ निकल सकती हूँ क्या ? जान ना ले लेंगे वो मेरी .

सुबह से चावल की बड़ियां और पापड़ बना रही थी ,आँगन में सूखने डाला है।

भुवना के लिए लेकर जाना है ।

लो, इन सब चक्करों में तुम्हें एक बात तो बताना ही भूल गई  ,जवाई बाबू की चिट्ठी आई है, खुशखबरी है।लिखा है भुवना पेट से है ।

अब ये आ जाएं कैम्प से , तब भुवना के यहाँ जाएंगे ।

भाभी जो अभी तक अंदर से ही बात कर रही थी , ये खबर सुन मुस्कराती हुई बाहर आई ।

सरस्वती को गले लगा उसे बधाइयाँ देने के साथ साथ  भुवना और उसके होने वाले बच्चे के लिए भी आशीर्वचनों की झड़ी लगा दी भाभी ने .

ये किताब पढ़ना बन्द कर बाहर आ गया ।

हवा का नामोनिशान ना था ,पेड़ों के पत्ते तक जहाँ के तहाँ रुके हुए थे।

सृष्टि मानो थम सी गई थी ।

अचानक ज़ोरों की बारिश शुरू हो गई और चांदी के तारों सी पानी की रेखाएँ आसमान से ज़मीन तक खींच गई ।

भाभी सरस्वती के घर की तरफ दौड़ी,उसे वहाँ सूख रहे पापड़ और बड़ियों की चिंता थी ।

पापड़ और बड़ियाँ जिस चटाई पर सूख रही थीं , उसे खींचती हुऐ ,मदद के लिए भाभी ने इसको आवाज़ लगाई .

-कल्याणी ,जल्दी आओ इन बड़ियों को अंदर रखवा दो , वरना सब खराब हो जायेंगी, बेचारी सरस्वती ने इतनी मेहनत की है अपनी गर्भवती बेटी के लिए बनाई है और

ये बारिश उसकी सारी मेहनत पर पानी फेर देगी “।

भाभी का सरस्वती के लिए ये दयाभाव देख इसे गुस्सा आ गया .

-ऐसी भी क्या फ़िल्म देखना कि अपनी ज़िम्मेदारियाँ ही भूल जाओ,वो भी एक घटिया और बकवास फ़िल्म .

-अरे ,इतनी झुलसती गर्मी में बारिश आ जायेगी ,ये उस बेचारी को थोड़े ही पता था ?अगर उसे पता होता , तो वह बड़ियां बनाती ही क्यों ?

जब भाभी पड़ोसन की पैरवी कर इसे समझा रही थी , तभी

हाँ ,तभी वो हादसा हुआ ।

 

पीछे से लहराता झूला आकर भाभी की पीठ से टकराया ।

भाभी लड़खड़ाई।

भाभी का पैर उन बड़ियां पर पड़ा जो बारिश के पानी की वजह से बुरी तरह गीली हो चुकी थी। उन पर पैर पड़ते ही भाभी जो फिसली फिर सम्भल ना पाई, मुँह के बल ज़मीन से जा टकराई ।

ज़मीन से टकराते ही उनका माथा ,मुँह और ठोडी इतने बुरे तरह से फट गये कि अंदर की सारी हड्डियां दिखाई देने लगी।

और भाभी के आस पास

बस खून ही खून .

अचानक हुए इस हादसे से सहमे बच्चे झटके से झूले से उतरे और भाभी को घेरकर खड़े हो गए ।

उनकी आंखों में डर था ।उनमें से कुछ तो ज़ोरों से रोने लगे ।

एक छोटा बच्चा जिसके छोटे से जीवन में अभी तक किसी चोट , दुख- दर्द का अनुभव नहीं था,

वो भाभी के चेहरे पर लगे बड़ी के छोटे -छोटे टुकड़ों को देख खिलखिलाकर हँसने लगा ।

बच्चों की हंसी कल्याणी सहन ना कर पाया.

उस बच्चे को ज़मीन पर पटक बेहरहमी से पीटना और उस पर चिल्लाना शुरू कर दिया उसने ।

-भाभी को इतनी चोट लगी है और तुम्हें हंसी सूझ रही है ….

-अरे,बच्चे को क्यों मार रहे हो ?

अपने असहनीय दर्द के बावजूद,  भाभी बच्चे का बचाव करते बोली।

भाभी नहीं रहीं .

सब अलग -अलग कारण बता रहे थे .

कोई कह रहा था कि टिटनेस की वजह से तो कोई कह रहा था खून ज्यादा बह गया था और समय पर सही इलाज ना मिला ।

भाभी का मृत शरीर झूले पर रखा हुआ था ,उनको देख ऐसा लग रहा था जैसे  शांति से सोई हुई हों ।

झूले पर ही उनको अंतिम स्नान करवाया गया और वहीं से उनकों अन्तिम संस्कार के लिए ले गए ।

वे सारे बच्चे जिन्हें भाभी और जो भाभी को दिलोजान से चाहते थे , झूले को घेरकर खड़े थे ।

भुवना और उसका पति भी .

भाभी लेटी हुई थी .

चुपचाप

किसी से कोई बात नहीं

ना किसी से कोई शिकवा

ना किसी बात का कोई जबाब

शांत

सब घड़े भर -भरकर उनपर पानी डाल उन्हें स्नान करवा रहे थे।

उनके साथ स्नान कर रहा था झूला भी ।

लगभग डूब गया था झूला पानी में ।

इस दुर्घटना को हुए बहुत समय बीत चुका ।

कितना ?

ये भी भूल चुका है कल्याणी ।

पर जब भी झूले को देखता .

उसे छू कर देखता .

झूला गीला ही महसूस होता ।

महसूस होती

एक नमी

नमी

जो मौजूद थी

इसके अंदर -बाहर

एक ऐसी नमी

जिसे चाह कर भी सुखाया नहीं जा सकता

उसे सुखाने की चाह कभी हुई ही नहीं इसको.

***

To read the story in Tamil: http://www.akshra.org/%e0%ae%88%e0%ae%b0%e0%ae%ae%e0%af%8d/

AKSHRA
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